Ethiclogy

विश्व का प्रथम जीवाणु युद्ध जो यदि पूर्ण होता तो सम्पूर्ण पृथ्वी नष्ट हो जात



              

दैत्यराज बाली के सबसे बड़े पुत्र का नाम बाणासुर था. वह बचपन से ही शिव भक्त था. जब वह बड़ा हुआ तब उसने हिमालय पर जाकर शिव की घोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर सहस्त्रबाहु और बलशाली होने वरदान प्राप्त किया. जिससे युद्ध में उसके आगे कोई टिक नही पता था उसे अपने बल पर बहुत अभिमान था. बाणासुर की एक पुत्री थी जिसका नाम उषा था जो कि श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध पर मोहित थी अनिरुद्ध भी उससे प्रेम करता था जब यह बात बाणासुर को पता चली तो उसने अनिरुद्ध को बंदी बना लिया. इधर जब श्री कृष्ण को पता चला तो वह अपनी सेना के साथ बाणासुर से युद्ध करने निकले. युद्ध में जब बाणासुर ने जब भगवान कृष्ण का पलड़ा भारी होते देखा तो उसने अपने आराध्य शिवजी को याद किया. अपने भक्त की पुकार सुन शिव जी ने अपने र्रुद्रगणों की सेना को युद्ध में भेजा. परन्तु उन्हें श्री कृष्ण और बलराम की सेना से पराजित होना पड़ा. अंत में महादेव अपने भक्त की रक्षा के लिए आये. शिवजी और कृष्ण भगवान के मध्य इतना भयंकर युद्ध हुआ कि सम्पूर्ण पृथ्वी कांपने लगी. जब भगवान कृष्ण किसी भी तरह पीछे हटने को तैयार नही थे तब शिवजी ने विवश होकर अपना त्रिशूल उठाया.भगवान शिव के सभी अस्त्रों को श्री कृष्ण के ब्रह्मास्त्र ने काट डाला इसलिए शिव जी ने अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया। परन्तु श्री कृष्ण ने उनके ब्रह्मा्त्र को वायव्यास्त्र से, पर्वतास्त्र को आग्नेयास्त्र से, परिजन्यास्त्र तथा पशुपत्यास्त्र को नारायणास्त्र से नष्ट कर दिया। श्रीकृष्ण पुनः बाणासुर पर टूट पड़े. बाणासुर भी अति क्रोध में आकर उनपर टूट पड़ा. अंत में श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र निकाला और बाणासुर की भुजाएं काटनी प्रारंभ कर दी। श्रीकृष्ण ने वाणासुर की चार बाजू छोड़कर बाकी सब बाजू काट डाली। तब सभी देवताओ ने मिलकर शिवजी और कृष्ण भगवान से युद्ध समाप्त करने का आग्रह किया तब भगवान शिव ने वाणासुर से कहा “रे मूर्ख, ये ईश्वर के भी ईश्वर हैं, तू इनकी शरण में जाकर उद्धार पा सकता है”। भगवान शंकर की बात सुनकर वाणासुर श्रीकृष्ण के चरणों में जा गिरा और उनसे क्षमा मांगने लगा। श्रीकृष्ण ने वाणासुर को क्षमादान दिया और अनिरुद्ध के साथ ऊषा का विवाह संपन्न हुआ।