Ethiclogy

मूर्तियों का विसर्जन क्यों किया जाता है?



              

देवी-देवताओ की मूर्ति का विसर्जन जल में किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार जल ब्रह्म का स्वरुप माना गया है। क्योंकि सृष्टि के आरंभ में और अंत में संपूर्ण सृष्टि जल में ही समाई रहती है. हर जगह सिर्फ जल ही जल होता है। और जल को बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक भी माना जाता है। जल में ही श्रीहरि का निवास है इसलिए वह नारायण भी कहलाते हैं। और जो भी इस संसार में आता हें उसको वापस जाना ही पड़ता है विसर्जन ये सिखाता है कि मिट्टी से जन्में शरीर को मिट्टी में ही मिलना है। भगवान की प्रतिमा मिट्टी से बनती है और पूजा के बाद वो मिट्टी में मिल जाती है। मतलब ये कि जो लिया है उसे लौटाना ही पड़ेगा, खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही जाना पड़ेगा। इंसान को अगला जन्म पाने के लिए इस जन्म का त्याग करना ही पड़ता है. की मूर्ति बनती है, उसकी पूजा होती है लेकिन फिर उन्हें अगले साल आने के लिए इस साल विसर्जित होना पड़ता है। जीवन भी यही है, अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कीजिये और समय समाप्त होने पर अगले जन्म के लिए इस जन्म को छोड़ दीजिये। माना जाता है कि जब जल में देव प्रतिमाओं को विसर्जित किया जाता है तो देवी देवताओं का अंश मूर्ति से निकलकर वापस अपने लोक को चला जाता है यानी परम ब्रह्म में लीन हो जाता है। यही कारण है कि मूर्तियों को जल में विसर्जित किया जाता है।