Ethiclogy

क्यों नहीं करते शिवलिंग की पूरी परिक्रमा?



              

हिन्दू धर्म पंचांग के पांचवे माह श्रावन यानी सावन में शिव पूजा का विशेष महत्व है। हर शिव भक्त अपनी श्रद्धा, आस्था और शक्ति से शिव पूजा कर अपनी कामनाओं को पूरा करना चाहता है। लेकिन शास्त्रों में शिव उपासना के लिए शिवलिंग पूजा की मर्यादाएं भी नियत है। । शिवलिंग परिक्रमा भी शिव पूजा विधि का एक अंग है। हालांकि बहुत से लोग शिवलिंग के पूर्ण परिक्रमा करते हैं जो की गलत है, शिवपुराण के अनुसार केवल आधे-परिक्रमा ही किया जाना चाहिए जो हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी स्त्रोत (जहां से भगवान शिव को चढ़ाया जल बाहर निकलता है) तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौट दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें। इसे शिवलिंग की आधी परिक्रमा भी कहा जाता है। - जलाधारी या अरघा के स्त्रोत को लांघना नहीं चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि उस स्थान पर ऊर्जा और शक्ति का भंडार होता है। अगर शिवलिंग की परिक्रमा के दौरान जलाधारी को लांघा जाए, तो लांघते वक्त पैर फैलने से वीर्य या रज और इनसे जुड़ी शारीरिक क्रियाओं पर इस शक्तिशाली ऊर्जा का बुरा असर हो सकता है। इसलिए जब भी शिवलिंग पूजा करें, इस बात का ध्यान रखकर अनजाने में होने वाले इस देव दोष से बचें। एक पुरानी कथा के अनुसार, एक बार राजा गंधर्व, जो शिव भक्त थे, परिक्रमा के दौरान शिवलिंगा पर अभिषेक करते समय जलधारी को लांघते चले गए इसके परिणामस्वरूप उनकी सभी शक्तियां और बुद्धि समाप्त हो गई । इसलिए, यह सलाह दी जाती है कि शिवलिंग की अर्ध-परिक्रमा ही करें।