Ethiclogy

हिन्दू धर्म में संस्कारों का अधिक महत्व क्यों है ?



              

भारतीय संस्क्रति का मुलभूत उद्देश्य श्रेष्ठ संस्कारवान मानव का निर्माण करना है। सामाजिक दृष्टि से सुख-समृद्धि और भोतिक ऐश्वर्य आवश्यक है किन्तु मनुष्य जीवन केवल खाने-पीने और मौज=मस्ती के लिए ही नही है। वेद- पुराणों में शिशु के गर्भ में प्रवेश करने से लेकर अंततः शरीर छोड़ने तक 16 संस्कारों का विधान है. संस्कारों से मनुष्य के मन के विकार नष्ट होते है और व्यक्ति प्रभावशाली बनता है। संस्कार का साधारण अर्थ किसी दोषयुक्त वस्तु को दोषरहित करना है अर्थात् जिस प्रक्रिया से वस्तु को दोषरहित किया जाए उसे संस्कार कहते है हमारे ऋषि-मुनि मानते थे कि जन्म-जन्मांतरों की वासनाओ का लेप जीवात्मा पर रहता है। पूर्व जन्म के इन्ही संस्कारों के अनुरूप ही जीव नया शरीर धारण करता है अर्थात् जन्म लेता है, और उन संस्कारों के अनुसार ही कर्मो के प्रति उसकी आसक्ति होती है. ये संस्कार प्रत्येक जन्म में संग्रहित होते चलते है, जिससे इनका एक विशाल भंडार बन जाता है, जिसे संचित कर्म कहा जाता है। इन संचित कर्मो का कुछ ही भाग एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है, जो वर्तमान जीवन में प्रेरणा का कार्य करता है. ये संस्कार अच्छे बुरे होने के कारण ही मनुष्य अपने जीवन में अच्छे बुरे कर्म करता है। इन कर्मो से पुनः नये संस्कार बनते है इस प्रकार इन संस्कारों की एक श्रंखला बनती चलती है जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।