Ethiclogy

करवा चौथ पर चाँद क्यों पूजते है और छलनी से चाँद व पति देखने शुरुआत किसने की थी



              

रामचरितमानस के लंका कांड के अनुसार, जिस समय भगवान राम समुद्र पार कर लंका में स्थित सुबेल पर्वत पर उतरे और श्रीराम ने पूर्व दिशा की ओर चमकते हुए चंद्रमा को देखा तो अपने साथियों से पूछा - चंद्रमा में जो कालापन है, वह क्या है? सभी ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जवाब दिया। किसी ने कहा चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई देती है। किसी ने कहा राहु की मार के कारण चंद्रमा में कालापन है तो किसी ने कहा कि बादलों की काली छाया उसमें दिखाई देती है। तब भगवान राम ने कहा- विष चंद्रमा का बहुत प्यारा भाई है (क्योंकि चंद्रमा और विष दोनों ही समुद्र मंथन से निकले थे)। इसीलिए चंद्रमा ने विष को अपने ह्रदय में स्थान दे रखा है, जिसके कारण चंद्रमा में कालापन दिखाई देता है। और अपनी विषयुक्त किरणों को फैलाकर वह वियोगी पति –पत्नियों का जलता रहता है। इस पूरे प्रसंग का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि जो पति-पत्नी किसी कारणवश एक-दूसरे से बिछड़ जाते हैं, चंद्रमा की किरणें उन्हें अधिक कष्ट पहुंचाती हैं। इसलिए करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा कर महिलाएं ये कामना करती हैं कि किसी भी कारण उन्हें अपने पति का वियोग न सहना पड़े। यही कारण है कि करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा करने का विधान है। एक पैराणिक कथा है। एक पतिव्रता स्त्री जिसका नाम वीरवती था इसने विवाह के पहले साल करवाचौथ का व्रत रखा। लेकिन भूख के कारण इसकी हालत खराब होने लगी। भाईयों से बहन की यह स्थिति देखी नहीं जा रही थी। इसलिए चांद निकलने से पहले ही एक पेड़ की ओट में छलनी के पीछे दीप रखकर बहन से कहने लगे कि देखो चांद निकल आया है। बहन ने झूठा चांद देखकर व्रत खोल लिया। इससे वीरवती के पति की मृत्यु हो गई। वीरवती को जब पति की मृत्यु की सूचना मिली तो वह व्याकुल हो उठी। वीरवती को पता चला कि उसके भाइयों ने जिसे चांद कहकर व्रत खोलवा था वह चांद नहीं छलनी में चमकता दीप था। असली चांद को देखे बिना व्रत खोलने के कारण ही उसके पति की मृत्यु हुई है। वीरवति ने अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने दिया बल्कि उसके शव को सुरक्षित अपने पास रखा और अगले वर्ष करवाचौथ के दिन नियम पूर्वक व्रत रखा जिससे करवामाता प्रसन्न हुई। वीरवती का मृत पति जीवित हो उठा। सुहागन स्त्रियां इस घटना को हमेशा याद रखें। कोई छल से उनका व्रत तोड़ न दे, इसलिए स्वयं छलनी अपने हाथ में रखकर उगते हुए चांद को देखने की परंपरा शुरू हुई। करवा चौथ में छलनी लेकर चांद को देखना यह भी सिखाता है कि पतिव्रत का पालन करते हुए किसी प्रकार का छल उसके प्रतिव्रत को डिगा न सके। इस पूजा में मिट्टी के करवा का प्रयोग इसलिए करते है क्योकि करवा पंचतत्व का प्रतीक है, मिट्टी को पानी में गला कर बनाते हैं जो भूमि तत्व और जल तत्व का प्रतीक है, उसे बनाकर धूप और हवा से सुखाया जाता है जो आकाश तत्व और वायु तत्व के प्रतीक हैं फिर आग में तपाकर बनाया जाता है इस तरह मिट्टी के करवे से पानी पिलाकर पति पत्नी अपने रिश्ते में पंच तत्व और परमात्मा दोनों को साक्षी बनाकर अपने दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने की कामना करते हैं। सुहागिनों को इस दिन खास तौर पर ध्यान रखना चाहिए कि सुहाग सामग्री यानि चूड़ी, लहठी, ब‌िंदी, स‌िंदूर को कचड़े में बिल्कुल ना फेंके. इतना ही नहीं अगर चूड़ी पहनते वक्त टूट भी जाए तो उसे संभालकर पूजा स्थान पर रख दें. आज के दिन सबसे खास बात ध्यान रखें कि अपने मन में पति के अलावा किसी भी अन्य पुरूष का किसी भी तरह का कोई विचार ना लाएं. करवा चौथ का व्रत रखने वाली सुहागिनों को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि आज के दिन स‌िलाई, कटाई, बुनाई के ल‌िए कैंची, सुई, चाकू का इस्तेमाल न करें.