Ethiclogy

प्रदक्षिणा क्यों की जाती है?



              

हिन्दू धर्म में प्रदक्षिणा का बहुत महत्व है प्रदक्षिणा (परिक्रमा) का अर्थ है किसी स्थान पर या किसी व्यक्ति के चारो तरफ दक्षिण दिशा में घूमना। दुनिया में सभी धर्मी में प्रदक्षिणा का चलन हिन्दू धर्म की ही देंन है इसलिए काबा में भी परिक्रमा होती है और बोधिगाया में भी। प्रदक्षिणा में है दक्षिण दिशा में घूमते है इसलिए इसे प्रदक्षिणा कहते है। इसका एक दार्शनिक महत्व भी है की सम्पूर्ण ब्रम्हांड का प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र किसी न किसी तारे की परिक्रमा कर रहा है यह ही जीवन का सत्य है। हमारे धर्म में सभी देवताओ की अलग-अलग परिक्रमा करने का विधान है जैसे शिव जी की आधी परिक्रमा की जाती है क्योकि शिवलिंग पर चढने वाला जल गंगाजल की तरह पवित्र हो जाता है जिसे लांघा नहीं जाता। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र।तथा दुर्गा माँ की एक, सूर्य की सात, गणेश की तीन, विष्णु जी की चार तथा हनुमान जी की तीन परिक्रमा की जाती है। प्रदक्षिणा करने के कुछ नियम है परिक्रमा प्रारंभ करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए। परिक्रमा वहीं पूर्ण करें, जहां से प्रारंभ की गई थी। परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नहीं मानी जाती। परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत न करें। जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें। इस प्रकार परिक्रमा करने से अभीष्ट एवं पूर्ण लाभ की प्राप्ति होती है परिक्रमा पूर्ण करने के पश्चात भगवान को दंडवत प्रणाम करना चाहिए।