Ethiclogy

क्यों लिया था श्रीहरि ने ‘मत्स्य’ अवतार?



              

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार जब-जब संसार में पाप का घड़ा भरा है, श्रीविष्णु ने अवतार धारण करके उसका नाश किया है। भगवान विष्णु, हिंदू त्रिमूर्ति (तीन महा देवताओं) में से एक हैं। श्रीविष्णु ने मत्स्य अवतार क्यों लिया, इसके संबंध एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, इस कथा के अनुसार, जब प्रलय काल में सृष्टि समाप्त होने लगी तब नई सृष्टि के निर्माण के लिए और उपयोगी बीजों की रक्षा के लिए भगवान ने मत्स्य अवतार लिया। श्रीविष्णु ने जब संसार को प्रलय में डूबते हुए देखा, तब उसी क्षण उन्होंने एक मछली का रूप लेकर संसारिक जीवों को बचाने का प्रण लिया। भगवान मछली का रूप धारण कर प्रलयकाल में प्रकट हुए और जिस नौका में नई सृष्टि के बीज रखे थे, उसे सुरक्षित पहुँचाया। लेकिन एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, सत्यव्रत (जिन्हें पौराणिक संदर्भ में मनु ही माना गया है), उन्हें अचानक एक दिन एक मछली प्राप्त हुई। जैसे ही उन्होंने उस मछली को अपने हाथों में उठाया तो वह उनसे बात करने लगी। उस मछली ने मनु को आने वाले विशाल प्रलय के बारे में सूचना दी और बताया कि ‘तुम्हें ही संसार को बचाने में मेरी मदद करनी होगी। जैसा मैं कहूं, बस वही तुम करते चले जाओ’। मनु के मानने के बाद मछली ने सबसे पहले उनसे कहा, कि तुम मुझे एक घड़े में पानी भरकर उसमें डाल दो। जब मेरा आकार उस घड़े से बड़ा होने लगे, तो एक गड्ढा खोदना आरंभ कर दो, फिर उस गड्ढे में भी पानी भर दो और उसमें मुझे डाल दो। इसके बाद उस मछली ने कहा कि जब तुम्हे लगे कि मैं बड़ी से बड़ी चोट को सहने के लिए सक्षम हूं, तो इस गड्ढे को बड़े समुद्र में बदल देना। उस मछली ने मनु को एक नौका तैयार करने को कहा। कहा जाता है कि इस नौका में मनु को संसार के सभी महत्वपूर्ण एवं सप्त ऋषियों को बिठाने के लिए कहा था। इसके बाद शेषनाग को एक रस्सी का स्वरूप देते हुए नौका के ठीक सामने बांधा गया । इस रस्सी का एक छोर नौका से बंधा था और दूसरा मछली के मुख से। इस प्रकार से विष्णुजी ने अपने मत्स्य अवतार में संसार के महत्वपूर्ण जीवों को प्रलय से बचाया और पृथ्वी के सबसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया।