Ethiclogy

एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाए जाते ?



              

पद्म पुराण के अनुसार एकादशी के दिन भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा विधि-विधान से की जाती है। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। साथ ही इस दिन दान करने हजारों यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। इस दिन निर्जला व्रत रहा जाता है। जो लोग इस दिन व्रत नही रख पाते। वह लोग सात्विक का पालन करते है यानी कि इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा नहीं खाएं और झूठ, ठगी आदि का त्याग कर opदें। साथ ही इश दिन चावल और इससे बनी कोई भी चीज नहीं खानी चाहिए। वर्ष की चौबीसों एकादशियों में चावल न खाने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना गया है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है, किन्तु द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। असल, किवदंती है कि माता के क्रोध से रक्षा के लिए महर्षि मेधा ने देह त्याग दी थी। उनके शरीर का अंश भूमि में समा गया। कालांतर में वही अंश जौ एवं चावल के रूप में भूमि से उत्पन्न हुआ। जब महर्षि की देह भूमि में समाई, उस दिन एकादशी तिथि थी। अत: प्राचीन काल से ही यह परंपरा शुरू हो गई कि एकादशी के दिन चावल एवं जौ से बने भोज्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसलिए एकादशी के दिन इन पदार्थों का सेवन महर्षि की देह के सेवन के समान माना गया है। इसके अलावा एकादशी के दिन चावल न खाने का वैज्ञानिक कारण भी है। विज्ञान के अनुसार चावल में जल तत्व की मात्रा अधिक होती है। ज्योतिष शास्त्र की मानें तो जल तत्व की अधिकता मन को विचलित कर सकती है, क्योंकि जल और चंद्रमा में परस्पर आकर्षण होता है। चंद्रमा के कारण समुद्र में ज्वार आता है। इस प्रकार चावल का अधिक सेवन करने पर यदि शरीर में जल तत्व की मात्रा अधिक होगी तो मन अशांत महसूस करता है। अशांत मन से व्रत का पालन नहीं किया जाएगा। चूंकि एकादशी व्रत, संयम और साधना का दिन है। इसलिए मन को विचलित करने वाले पदार्थों से दूर रहने की हिदायत दी जाती है।