Ethiclogy

पिठोरी अमावस्या क्यों मनाई जाती हैं और इसका क्या महत्व है ?



              

भाद्रपक्ष महीने की अमावस्या, पिठोरी अमावस्या के रूप में मनाई जाती है। इस दिन महिलायें अपनी संतान की लम्बी आयु के लिए व्रत रखती है। ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा की कृपा से संतान को न सिर्फ लंबी आयु मिलती है, बल्कि मृत संतान को भी नया जीवन मिल सकता है। पिठौरी अमावस्या के दिन आटे से 64 देवियों के पिंड बनाकर उनकी पूजा की जाती है। उत्तर भारत में यह पर्व पिठोरी अमावस्या जबकि दक्षिण भारत में यह पर्व पोलाला अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। इस दिन उत्तर भारत में माता दुर्गा की और दक्षिण भारत में मां पोलेरम्मा की पूजा की जाती हैं। पोलेरम्मा को माँ दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है। यह व्रत उन सभी महिलाओं को करना चाहिए जिनके संतान हो। इस दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करे। स्नान के बाद सूर्य भगवान को जल अर्पण करना चाहिए। चूकि अमावस्या को पितरों का दिन कहा जाता है इसलिए इस दिन पिंड दान और तर्पण भी करना शुभ होता है। इसके पश्चात पूजन हेतु आटे से देवियों की 64 प्रतिमा या पिंड बनाकर ,इन सभी 64 प्रतिमा को एक साथ एक पाटे पर रखना होता है इस पूजा में भगवान को भोग लगाने के लिए आटे से बनने वाले व्यंजन ही बनाये जाते है । संध्या समय विधि विधान से देवी की पूजा कर पूजन के समय देवी की प्रतिमा को सुहाग का सामान चढ़ान चाहिए।