Ethiclogy

त्रिशिरा(Trishira) कौन थे? और किस प्रकार उनके शिश से पक्षियों की उत्त्पति हुई ?



              

त्वष्टा प्रजापति के साथ इंद्र ने छल किया था जिस कारण उन्होने एक पुत्र उत्पन्न किया जिसके तीन मस्तक थे उसे विश्वरूप भी कहते थे। त्रिशिरा(Trishira) एक मुख से वेद का पाठ करता था, दुसरे मुख से मधु-पान करता था और तीसरे से एक साथ सम्पूर्ण दिशाओं का निरीक्षण करता था। फिर उसने भोगों की ओर से उदासीन होकर अत्यंत कठिन तप आरम्भ कर दिया। त्रिशिरा(Trishira) को इस तरह तपस्या करता देख इंद्र घबरा गये और उनकी तपस्या को भंग करने के लिए अप्सराओ को आज्ञा दी। वे अपसराए कुछ दिनों तक उनके आश्रम पर रहीं परन्तु जब वह ध्यान से विचलित न हो सकें तब वे लौटकर इंद्र के पास आ गयीं। और हाथ जोडकर बोलीं महाराज हमने बहुत प्रयत्न किया परन्तु वह तपस्वी जितेन्द्रिय है उनके सामने हमारा बल कुछ भी काम न कर सका। तब स्वयं इंद्र क्रोधित होकर वहाँ गये और अपना वज्र त्रिशिरा(Trishira) मुनि पर चला दिया जिससे वह घायल होकर जमीन पर गिर पड़े । इसके बाद इंद्र अपने भवन को चले गये, पर वापस जाकर सोचा कि कहीं त्रिशिरा(Trishira) पुन; जीवित तो नही हो जायेगा इसलिए इंद्र ने एक तक्षा नामक व्यक्ति को प्रलोभन देकर उनका वध करने के लिए भेज दिया। वहाँ जाकर उसने अपनी मजबूत टांगी उठाई और त्रिशिरा के मस्तक धड़ से अलग कर दिए। उन तीनो मस्तक के धरती पर गिरते ही उनसे हजारों पक्षियों का जन्म हो गया। त्रिशिरा(Trishira) मुनि जिस मुख से वेद का पाठ करते थे और सोमरस पीते थे उससे तुरंत कबूतर निकल आये, सोमरस पीते समय समस्त दिशाओं पर द्र्ष्टि रखने के लिए त्रिशिरा(Trishira) मुनि जिस मुख का प्रयोग करते थे, उससे अत्यंत चमकीले तितिर उत्पन्न हुए। और त्रिशिरा(Trishira) मुनि के मधुपान वाले मुख से गौरेंया की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार त्रिशिरा(Trishira) के मस्तक से यह पक्षी प्रकट हुए। jg