Ethiclogy

माँ सप्तश्रृंगी कौन है और कहाँ से आया उनका ये रूप ?



              

माँ सप्तश्रृंगी देवी को ब्रह्मस्वरूपिणी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्म देवता के कमंडल से निकली गिरिजा महानदी देवी सप्तश्रृंगी का ही रूप है। सप्तश्रृंगी की महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती के त्रिगुण स्वरूप में भी आराधना की जाती है। कहते हैं कि जब भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ना‍सिक के तपोवन में पधारे थे तब वे इस देवी के द्वार पर भी आए थे। कहा जाता है कि किसी भक्त द्वारा मधुमक्खी का छत्ता तोड़ते समय उसे यह देवी की मूर्ति दिखाई दी थी। तभी से यहाँ माता की पूजा की जाती है पर्वत में बसी माता की मूर्ति आठ फुट ऊँची है। इसकी अठारह भुजाएँ हैं। देवी सभी हाथों में शस्त्र लिए हुए हैं जो कि देवताओं ने महिषासुर राक्षस से लड़ने के लिए उन्हें प्रदान किए थे। यहाँ मुख्य मंदिर तक जाने के लिए करीब 472 सीढि़याँ चढ़ना पड़ती हैं। चैत्र और अश्विन नवरात्र में यहाँ उत्सव होते हैं। कहते हैं कि चैत्र में देवी का रूप हँसते हुए तो नवरात्र में गंभीर नजर आता है। इस पर्वत पर पानी के 108 कुंड हैं, जो इस स्थान की सुंदरता को कई गुना बड़ा देते है कहा जाता है कि जब महिषासुर राक्षस के विनाश के लिए सभी देवी-देवताओं ने माँ की आराधना की थी तभी ये देवी सप्तश्रृंगी रूप में प्रकट हुई थीं। भागवत कथा में पूरे देश में एक सौ आठ शक्तिपीठ मौजूद होने का उल्लेख किया गया है जिसमें से साढ़े तीन महाराष्ट्र में हैं। सप्तश्रृंगी को अर्धशक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। इसके अलावा किसी भी पुराण में अर्धशक्तिपीठ होने का उल्लेख नहीं किया गया है।