Ethiclogy

कालभैरव कौन हैं और कालभैरव अष्टमी क्यों मनाई जाती हैं ?



              

मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को काल भैरवाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान महादेव ने कालभैरव के रूप में अवतार लिया था। भगवान शिव के दो स्वरूप हैं -बटुक भैरव और काल भैरव। जहाँ बटुक भैरव का रूप सौम्य हैं वहीं कालभैरव का रूप भयंकर और विकराल हैं। भैरवजी को काशी का कोतवाल भी माना जाता है। एक बार भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानि त्रिदेवों के बीच विवाद हो गया था कि उनमें से कौन सर्वश्रेष्ठ है। विवाद को सुलझाने के लिये समस्त देवी-देवताओं को बुलाया गया। सभा में काफी मंथन करने के पश्चात जो निष्कर्ष निकला उससे भगवान शिव और विष्णु तो सहमत हो गये लेकिन ब्रह्मा जी संतुष्ट नहीं हुए। और उन्होंने भगवान शिव का अपमान भी किया जिससे भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गये। भगवान शंकर के इस भयंकर रूप से ही काल भैरव की उत्पत्ति हुई। जिन्हें देखकर सभा में उपस्थित समस्त देवी देवता डरने लगे। कालभैरव जो कि काले कुत्ते पर सवार होकर हाथों में दंड लिये अवतरित हुए थे उन्होंने ब्रह्मा जी पर प्रहार कर उनके पाँच सिरों में से एक सिर को अलग कर दिया। ब्रह्मा जी के पास अब केवल चार शीश ही बचे थे ,फिर उन्होंने क्षमा मांगकर काल भैरव के कोप से स्वयं को बचाया। परन्तु ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए वह बहुत भटके और भटकते भटकते काशी पहुंच गए जहां उन्हें ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली। और बाद में उन्हें वहां का कोतवाल नियुक्त कर दिया गया था। इस दिन किसी भी कुत्ते को कष्ट नहीं देना चाहिए बल्कि पूजा के बाद उन्हें हलबा,जलेबी का भोग लगाना चाहिए।