Ethiclogy

जब स्वयं महादेव भी नहीं बच पाए शनि की वक्र दृष्टी से ।



              

शनिदेव निष्पक्ष दंडाधिकारी है। चाहे देव हो या असुर मनुष्य हो या पशु सबको उनके कर्मो के आधार पर दंड देते है। शास्त्रों में देखने पर पता चलता है कि स्वयं भगवान शिव ही उनके गुरु है। एक पौराणिक कथा के अनुसार एक समय शनि देव भगवान शंकर के धाम हिमालय पहुंचे। उन्होंने अपने गुरुदेव भगवान शंकर को प्रणाम कर उनसे आग्रह किया,हे प्रभु! मैं कल आपकी राशि में आने वाला हूं अर्थात मेरी वक्र दृष्टि आप पर पड़ने वाली है. शनिदेव की बात सुनकर भगवान शंकर सोच में पड गये और बोले,हे शनिदेव! आप कितने समय तक अपनी वक्र दृष्टि मुझ पर रखेंगे। तब शनिदेव बोले,हे नाथ! कल सवा प्रहर के लिए आप पर मेरी वक्र दृष्टि रहेगी। शनिदेव की बात सुनकर भगवान शंकर चिंतित हो गए और शनि की वक्र दृष्टि से बचने के लिए उपाय सोचने लगे। शनि की दृष्टि से बचने हेतु अगले दिन भगवान शंकर धरती पर आए। और एक हाथी का रूप धारण कर लिया। भगवान शंकर हाथी के रूप में सवा प्रहर तक धरती में जहां तहां विचरण करते रहे फिर शाम होने पर भगवान शंकर ने सोचा,अब दिन बीत चुका है और शनिदेव की दृष्टि का भी मुझ पर कोई असर नहीं होगा। इसके उपरांत भगवान शंकर पुनः कैलाश पर्वत लौट आए। भगवान शंकर प्रसन्न मुद्रा में जैसे ही कैलाश पर्वत पर पहुंचे वहाँ शनिदेव पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे। भगवान शंकर को देख कर शनिदेव ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। तब भगवान शंकर मुस्कराकर शनिदेव से बोले आपकी दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। यह सुनकर शनि देव मुस्कराए और बोले," मेरी दृष्टि से न तो देव बच सकते हैं और न ही दानव यहां तक कि आप भी मेरी दृष्टि से बच नहीं पाए। यह सुनकर भगवान शंकर आश्चर्यचकित रह गए। शनिदेव ने कहा, मेरी ही दृष्टि के कारण आपको सवा प्रहर के लिए देव योनी को छोड़कर पशु योनी में जाना पड़ा इस प्रकार मेरी वक्र दृष्टि आप पर पड़ गई और आप इसके पात्र बन गये. शनि की न्यायप्रियता देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गये और शनि देव को गले से लगा लिया।