Ethiclogy

कार्तिकेय के जन्म से जुड़ी कथा



              

भगवान कार्तिकेय को शिव-पार्वती का पुत्र कहा जाता है परन्तु कार्तिकेय को जन्म माँ पार्वती ने नही दिया था इस सन्दर्भ में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है- माता सती के आत्मदाह के पश्चात् शिव के क्रोध की ज्वाला खत्म नही हो रही थी। और एक तरफ तारकासुर को मिले वरदान के कारण वह बहुत शक्तिशाली हो गया था वरदान के अनुसार केवल शिव पुत्र ही उसका वध कर सकता था। और इसी कारण तीनो लोको में हाहाकार मच गया था। इसीलिए सारे देवता भगवान विष्णु के पास जा पहूँचे। और विष्णु जी को साथ लेकर समस्त देवगण जब कैलाश पहुंचे तब उन्हेँ पता चला कि शिवजी और माता पार्वती तो विवाह के पश्चात से ही देवदारु वन एकांतवास के लिए जा चुके हैँ। जब वहां पहुंचे तब उन्हेँ पता चला की शिवजी और माता पार्वती वन मेँ एक गुफा मेँ निवास कर रहे हैँ। देवताओँ ने शिवजी से मदत की गुहार लगाई किँतु कोई लाभ नहीँ था, भोलेभंडारी तो कामपाश मेँ बंधकर अपनी अर्धाँगिनी के साथ सम्भोग करने मेँ रत थे। उनको जागृत करने के लिए अग्नि देव ने उनकी कामक्रीड़ा मे विघ्न उत्पन्न करने की ठान ली। सम्भोग के समय परपुरुष को समीप पाकर देवी पार्वती ने लज्जा से अपना सुंदर मुख कमलपुष्प से ढक लिया। देवी का वह रुप लज्जा गौरी के नाम से प्रसिद्द हो गया। कामक्रिड़ा मेँ मग्न शिव जी ने अग्निदेव को देखा लेकिन इतने मेँ कामातुर शिवजी का अनजाने मेँ वीर्यपात हो गया। अग्निदेव ने उस अमोघ वीर्य को कबुतर का रुप धारण करके ग्रहण कर लिया व तारकासुर से बचा क्र लर गये। किँतु उस वीर्य का ताप इतना अधिक था की अग्निदेव से भी सहन नहीँ हुआ। इस कारण उन्होँने उस अमोघ वीर्य को गंगादेवी को सौँप दिया। जब देवी गंगा उस दिव्य अंश को लेकर जाने लगी तब उसकी शक्ती से गंगा का पानी उबलने लगा। भयभीत गंगादेवी ने उस दिव्य अंश को शरवण वन मेँ लाकर स्थापित कर दिया किँतु गंगाजल मेँ बहते बहते वह दिव्य अंश छह भागोँ मे विभाजित हो गया था। भगवान शिव के शरीर से उत्पन्न वीर्य के उन दिव्य अंशोँ से छह सुंदर व सुकोमल शिशुओँ का जन्म हुआ। उस वन में विहार करती छह कृतिका कन्याओ की द्रष्टि उनपर पड़ी तो उनके मन में बालको के प्रति प्रेम जागा और वह उन्हें ले जाकर पालन करने लगीं। जब इन सबके बारे मेँ नारद जी ने शिव पार्वती को बताया तब वे दोनोँ अपने पुत्र से मिलने के लिए व्याकुल हो उठे, व कृतिकालोक चल पड़े। जब माँ पार्वती ने अपने छह पुत्रोँ को देखा तब वो मातृत्व भाव से भावुक हो उठी, और उन्होने उन बालकोँ को इतने ज़ोर से गले लगा लिया की वे छह शिशु एक ही शिशु बन गए जिसके छह शीश थे। तत्पश्चात वह अपने पुत्र को लेकर कैलाश वापस आ गए। कृतिकाओँ के द्वारा लालन पालन होने के कारण उस बालक का नाम कार्तिकेय पड़ गया। कार्तिकेय ने बडा होकर राक्षस तारकासुर का संहार किया।