Ethiclogy

शंख का महत्व



              

शंख मुख्यतः दो प्रकार के होते है, वामावर्त शंख और दक्षिणावर्त शंख | वामावर्त संख को केवल पूजा के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है| कहा जाता है की इसमें भगवान विष्णु का निवाश होता है, शंख विष्णु का स्वरूप माना जाता है | दक्षिणवर्त शंख को मुख्यतः केवल वादन के लिए प्रयोग में लिया जाता है, इस शंख को देवी देवताओ के अभिषेक तथा किसी कन्या के कन्यादान के समय प्रयोग में लाया जाता है | शंख की स्थापना से माँ लक्ष्मी का घर में वाश होता है , स्वय माँ लक्ष्मी कहती है की शंख उनका सहोदर भ्राता है | भारतीय संस्कृति में शंख का महत्वपूर्ण स्थान है ,कहा जाता है की समुद्र मंथन से शंख 14 रत्नो के रूप में प्राप्त हुआ था तथा इसकी ध्वनि धर्म का मार्ग प्रशस्त करती है | भागवत पुराण के अनुसार इसके संबंध में एक कथा है की ऋषि संदीपन के आश्रम में श्री कृष्ण की शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात कृष्ण ने उनसे दक्षिणा लेने की आग्रह की | तब ऋषि ने कहा की नदी में डूबे मेरे पुत्र को जाके ले आओ, कृष्ण ने नदी में जाकर शंखासुर नमक दानव को मारा तथा ऋषि के पुत्र को उसकी कैद से छुड़ाया | कहा जाता है की शंखासुर नामक असुर जब मरा तो उसका खोल (शंख) अलग गिर गया, जो बाद में श्रीकृष्ण के पाञ्चजन्य शंख के नाम से प्रसिद्ध हुआ।