Ethiclogy

प्रदोष व्रत का महत्व



              

प्रदोष व्रत हर महीने में दो बार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रियोदशी तिथि को मनाया जाता है। यदि यह व्रत सोमवार को हो तो उसे सोम प्रदोष व्रत कहते है। यदि मंगल को हो तो उसे भौम प्रदोष व्रत और यदि शनिवार को हो तो उसे शनि प्रदोष व्रत कहते है। विशेषकर सोमवार.मंगलवार और शनिवार के प्रदोष व्रत अत्यधिक प्रभावकारी माने गये है। त्रियोदशी तिथि में सायंकाल को प्रदोष काल कहा जाता है मान्यता है कि प्रदोष के समय महादेव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न होकर नृत्य करते है और देवता उनकी आराधना करते है. जो व्यक्ति किसी भी प्रकार की परेशानी में हो और उससे निपटना चाहता हो तो वह प्रदोष व्रत रख सकता है इस व्रत को करने से हर दोष मिट जाता है। इस दिन व्यक्ति को निर्जल व्रत रखना होता है प्रदोष व्रत को वर्ष में ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए। इस दिन व्यक्ति को भगवान शिव की आराधना करना होती है। प्रदोष व्रत में बिना जल पिए व्रत रखना होता है। सुबह स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और नंदी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराकर बेल पत्र, गंध,चावल, फूल, धूप, दीप, फल, पान, सुपारी, लौंग व इलायची चढ़ाएं।शाम के समय भी पुन: स्नान करके इसी तरह शिवजी की पूजा करें। सभी वस्तुओं को दोबारा से शिवजी को अर्पित करें। प्रदोष का सबसे बड़ा महत्व है कि सोम (चंद्र) को, कृष्णपक्ष में प्रदोषकाल पर्व पर भगवान शंकर ने अपने मस्तक पर धारण किया था। यह सोम प्रदोष के नाम से जाना जाता है। प्रदोष का नाम इस लिए पड़ा क्योकि इस दिन शिव जी ने चन्द्र के दोष को दूर कर उसे श्राप मुक्त किया था।