Ethiclogy

भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र कैसे प्राप्त हुआ था ?



              

भगवान विष्णु का एक नाम चक्रधर भी है। इनका यह नाम इसलिए है क्योंकि इनकी उंगली में सुदर्शन चक्र घूमता रहता है। इस चक्र के विषय में कहा जाता है कि यह अमोघ है और जिस पर भी इसका प्रहार होता है उसका अंत करके ही लौटता है। भगवान विष्णु ने जब श्री कृष्ण रुप में अवतार लिया था तब भी उनके पास यह चक्र था। इसी चक्र से इन्होंने जरासंध को पराजित किया था, शिशुपाल का वध भी इसी चक्र से हुआ था। वामन पुराण में बताया गया है श्रीदामा नामक एक असुर था। जिसने सभी देवताओं को पराजित कर दिया। इसके बाद उसने भगवान विष्णु के श्रीवत्स को छीनने की योजना बनाई। इससे भगवान विष्णु क्रोधित हो गए और श्रीदामा को दंडित करने के लिए भगवान शिव के पास गए और उनकी तपस्या करने लगे। उन्होंने हजार नमों से शिवजी की स्तुति की तथा प्रत्येक नाम पर भगवान शिव को एक कमल पुष्प चढाते गए, तब भगवान शिव ने विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए उनके लाये हुए हजार पुष्प में से एक पुष्प गायब कर दिया. एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा कि मेरी आंखें ही कमल के समान हैं इसलिए मुझे कमलनयन और पुण्डरीकाक्ष कहा जाता है। एक कमल के फूल के स्थान पर मैं अपनी आँख ही चढ़ा देता हूं। ऐसा सोचकर भगवान विष्णु जैसे ही अपनी आँख भगवान शिव को चढ़ाने के लिए तैयार हुए, वैसे ही शिवजी प्रकट होकर बोले- हे विष्णु। तुम्हारे समान संसार में मेरा कोई दूसरा भक्त नहीं है और उन्हें वरदान मांगने को कहा – विष्णु जी ने दैत्यों को समाप्त करने के लिए अजेय शस्त्र का वरदान माँगा. तब शिव जी ने विष्णु जी को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। भगवान विष्णु ने कहा कि प्रभु यह अमोघ है इसे परखने के लिए मैं सबसे पहले इसका प्रहार आप पर ही करना चाहता हूं. भगवान शिव ने कहा अगर आप यह चाहते हैं तो प्रहार करके देख लीजिए। सुदर्शन चक्र के प्रहार से भगवान शिव के तीन खंड हो गए। इसके बाद भगवान विष्णु को अपने किए पर पश्चाताप हुआ और वे शिव की आराधना करने लगे। तब भगवान शिव प्रकट हुए और विष्णु जी से कहा कि आप निराश न होइये। सुदर्शन चक्र के प्रहार से केवल मेरा प्राकृत विकार ही कटा है। मैं और मेरे स्वभाव का हास् नहीं हुआ है यह तो अच्छेद्य(अभेद) और अदाह्य है। और मेरे शरीर के जो तीन खंड हुए हैं अब वह हिरण्याक्ष, सुवर्णाक्ष और विरूपाक्ष महादेव के नाम से जाने और पूजे जाएगें। इसके बाद भगवान विष्णु ने श्रीदामा से युद्घ किया और सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया।